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मणिकर्णिका घाट - काशी

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मान्यता है कि काशी की मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के शव की दाहक्रिया की थी। तबसे वह महाशमशान है, जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। एक चिता के बुझने से पूर्व ही दूसरी चिता में आग लगा दी जाती है। वह मृत्यु की लौ है जो कभी नहीं बुझती, जीवन की हर ज्योति अंततः उसी लौ में समाहित हो जाती है। शिव संहार के देवता हैं न, तो इसीलिए मणिकर्णिका की ज्योति शिव की ज्योति जैसी ही है, जिसमें अंततः सभी को समाहित हो ही जाना है। इसी मणिकर्णिका के महाश्मशान में शिव होली खेलते हैं।      शमशान में होली खेलने का अर्थ समझते हैं? मनुष्य सबसे अधिक मृत्यु से भयभीत होता है। उसके हर भय का अंतिम कारण अपनी या अपनों की मृत्यु ही होती है। श्मशान में होली खेलने का अर्थ है उस भय से मुक्ति पा लेना।        शिव किसी शरीर मात्र का नाम नहीं है, शिव वैराग्य की उस चरम अवस्था का नाम है जब व्यक्ति मृत्यु की पीड़ा,भय या अवसाद से मुक्त हो जाता है। शिव होने का अर्थ है वैराग्य की उस ऊँचाई पर पहुँच जाना जब किसी की मृत्यु कष्ट न दे, बल्कि उसे भी जीवन का एक आवश्यक हिस्सा मान कर उसे...

विक्रमादित्य के नवरत्न | Navratna of king Vikramaditya

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विक्रमादित्य के नवरत्न | Navratna of king Vikramaditya आपने अकबर के नवरत्नों के बारे में तो जरूर सुना होगा। आज हम जानेंगे राजा विक्रमादित्य के नवरत्न के बारे मे...... सनातन धर्म मे आज हम आपको विक्रमादित्य के नव रत्नों के बारे में संक्षेप में बता रहे हैं।  राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।  राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।   ये हैं नवरत्न – 1–धन्वन्तरि- नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है। 2–क्षपणक- जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे। इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में ...

80 के दशक का बचपन

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मै 80 के दशक का बचपन हूं... मैंने एनर्जी के लिए रुहआफ्जा से लेकर ट्रॉपिकाना तक का सफर तय किया है, माचिस की डब्बी वाले फोन से स्मार्टफोन तक का सफर तय किया है, मै वो समय हूं जब तरबूज बहुत ही बड़ा और गोलाकार होता था पर अब लंबा और छोटा हो गया, मैंने चाचा चौधरी से लेकर सपना चौधरी तक का सफर तय किया है, मैंने बालों में सरसों के तेल से लेकर जैल तक का सफर तय किया है चूल्हे की रोटी में लगी राख़ का भी स्वाद लिया है  मैंने दूरदर्शन से लेकर 500 निजी चैनल तक का सफर तय किया है। मैंने खट्टे मीठे बेरों से लेकर कीवी तक का सफर तय किया है। संतरे की गोली से किंडर जोय तक का सफर तय किया है। आज की पीढ़ी का दम तोड़ता हुआ बचपन में देख रहा हूं लेकिन आज की पीढ़ी मेरे समय के बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकती। मैंने ब्लैक एंड व्हाइट समय में रंगीन और गरीबी में बहुत अमीर बचपन जिया है। मेरे बचपन के समय को कोटि कोटि धन्यवाद।

पढ़िए एक हिन्दू बेटी के साथ हुए षडयंत्रों की वह सत्य कथा जिसने इंजीनियर दीपक त्यागी को स्वामी यति नरसिंहानन्द सरस्वती बनने पर विवश कर दिया !

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यति नरसिंहानन्द सरस्वती महाराज की कलम✍️ से ---- 👉  पढ़िए एक हिन्दू बेटी के साथ हुए षडयंत्रों  की वह सत्य कथा जिसने इंजीनियर दीपक त्यागी को स्वामी यति नरसिंहानन्द सरस्वती बनने पर विवश कर दिया ! मैं यति नरसिंहानंद सरस्वती डासना देवी मन्दिर का महंत हूँ।आज आप लोगो को वो कहानी सुनाना चाहता हूँ जिसने मुझे हिन्दू बनाया। मेरे जैसे लोगो की कहानिया कभी पूरी नहीँ होती क्योंकि जीवन हम जैसो के लिए बहुत क्रूर होता है।मेरी बहुत इच्छा है कुछ किताबे लिखने की पर शायद ये कभी नहीँ हो सकेगा क्योंकि हमारे क्षेत्र के मुसलमानो ने जीवन को एक नर्क में परिवर्तित कर दिया है जिससे निकालने की संभावना केवल मृत्यु में है और किसी में नहीँ है।मैं धन्यवाद देता हूँ सोशल मीडिया को जिसने अपनी बात रखने के लिये मुझ जैसो को एक मंच दिया है और मैं अपने दर्द को आप लोगो तक पहुँचा पाता हूँ।आज मैं आपको अपने जीवन की वो घटना बताना चाहता हूँ जिसने मेरे जीवन को बदल दिया था।ये एक लड़की की दर्दनाक और सच्ची कहानी है जिसने बाद में शायद आत्महत्या कर ली थी।इस घटना ने मेरे जीवन पर इतना गहरा प्रभाव डाला की मेरा सब कुछ बदल ...

श्री रामचन्द्र जी का वनवास मार्ग | Shree Ramchandra ji ka vanvas marg

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श्री राम चन्द्र जी का वनवास मार्ग 1.तमसा नदी : अयोध्या से 20 किमी दूर है तमसा नदी। यहां पर उन्होंने नाव से नदी पार की। 2.श्रृंगवेरपुर तीर्थ : प्रयागराज से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। श्रृंगवेरपुर को वर्तमान में सिंगरौर कहा जाता है।   3.कुरई गांव : सिंगरौर में गंगा पार कर श्रीराम कुरई में रुके थे।   4.प्रयाग: कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। कुछ महीने पहले तक प्रयाग को इलाहाबाद कहा जाता था ।   5.चित्रकूणट : प्रभु श्रीराम ने प्रयाग संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।   6.सतना: चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। हालांकि अनुसूइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा...

Narrative Building | Narrative kaise banaye jate hai | नैरेटिव कैसे गढ़े जाते हैं

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Narrative kaise banaye jaate hai | नैरेटिव कैसे गढ़े जाते हैं Narrative Building:  अर्थ और महत्व  एक गाँव में एक व्यापारी और एक कुम्हार था। कुम्हार ने व्यपारी से कहा, मैं तो बर्तन बनाता हूँ, पर गरीब हूँ... तुम्हारी कौन सी रुपये बनाने की मशीन है जो तुम इतने अमीर हो?  व्यापारी ने कहा - तुम भी अपने चाक पर मिट्टी से रुपये बना सकते हो। कुम्हार बोला - मिट्टी से मिट्टी के रुपये ही बनेंगे ना, सचमुच के तो नहीं बनेंगे। व्यापारी ने कहा - तुम ऐसा करो, अपने चाक पर 1000 मिट्टी के रुपये बनाओ, बदले में मैं उसे सचमुच के रुपयों में बदल कर दिखाऊँगा। कुम्हार ज्यादा बहस के मूड में नहीं था... बात टालने के लिए हाँ कह दी। महीने भर बाद कुम्हार से व्यापारी ने फिर पूछा - क्या हुआ ? तुम पैसे देने वाले थे... कुम्हार ने कहा - समय नहीं मिला... थोड़ा काम था, त्योहार बीत जाने दो... बनाउँगा... फिर महीने भर बाद चार लोगों के बीच में व्यापारी ने कुम्हार को फिर टोका - क्या हुआ? तुमने हज़ार रुपये नहीं ही दिए... दो महीने हो गए... वहां मौजूद एक-आध लोगों को कुम्हार ने बताया की मिट्टी के रुपयों की बात है।...

जब उनके शीश समरभूमि में उतरते थे.. वो एसे लोग थे जिनके कबंध लड़ते थे..

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जब उनके शीश समरभूमि में उतरते थे..  वो एसे लोग थे जिनके कबंध लड़ते थे..  ये दो पंक्तियाँ लिखी गयी हैं  #गोरा_और_बादल 🙏🙏 के लिए कितने पराक्रमी होंगे ये दोनों इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है... सेनापति गोरा जिनका शीश कट गया फिर  भी लड़ते रहे.. 🙏🙏 इनके पराक्रम को बतलाते हुए राज कवि श्री नरेन्द्र मिश्र जी ने लिखा है जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा । महाकाल से भी राणा का मस्तक नही कटेगा ।। तुम निशिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी । और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी ।। राणा के सकुशल आने तक गोरा नही मरेगा । एक पहर तक सर कटने पर भी धड़ युद्ध करेगा।। क्या अद्भुत प्रतिज्ञा ली थी कि यदि सर कट भी गया फिर भी धड़ युद्ध करते रहेंगे... अद्भुत प्रतिभा के धनी थे हमारे वीर गोरा और उनका भतीजा बादल... ऐसे महान योद्धा को शत शत नमन 🙏 🙏 #🙏🙏🙏🙏🙏 #JayMahakal 🙏🙏